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छत्तीसगढ़ी में पढ़ें- चार दिन के जिनगानी

का होगे कउंवा मन आजकल कांव-कांव नइ करत हे, बिलई मन मियाउं-मियाउं नइ करत हे, कुकुर मन भुके बर भुलागे हे, कोलिहा मन हुंआ-हुंआ नइ करत हे, सुआ अउ पड़की-परेवना मन के घला बोलती बंद होगे हे. खबर तो ये घला मिलत हे के जंगल के शेर, भालू मन के दहड़ई घला सटकगे हे. गजराज मन घला चिंघाड़े ले छोड़ देहे, कइसे का होगे हे ते ओकरो मन के कांही आरो नइ मिलत हे?

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